अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस: अपनी भाषा का उत्सव

संत जेरोम द्वारा किये गए बाईबल के हिब्रू से लेटिन भाषा में अनुवाद के आधार पर, उसे अनुवाद प्रक्रिया का प्रारंभ मानते हुए ३० सितंबर को प्रतिवर्ष अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस मनाया जाता है। आज तकनीक के विस्तार के साथ ही भाषा केवल एक संवाद का माध्यम भर नही रह गई है। अवसरों की बारिश में सभी भीगना चाहते हैं, अपनी भाषा को सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ना चाहते हैं। और अच्छी बात यह है कि भाषा किसी मां के समान, सभी को समान भाव से वात्सल्य बांटती भी है।

किसी विशेष भाषा का दिवस उसके उत्थान, प्रचलन और भक्ति का दिवस हो सकता है लेकिन अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस विश्व की सभी भाषाओं का उत्सव है। आज हम प्रत्येक संस्कृति में झांककर देखना चाहते हैं, प्रत्येक भौगोलिक भाग की विशेषताओं को जीकर देखना चाहते हैं। संगीत के स्वरों के समान ही आज भाषायी शब्द भी ह्र्दय से ह्र्दय तक पहुंचने का हुनर रखते हैं।

अनूदित पुस्तकों के माध्यम से हम संस्कृति, सोच, साहित्य और मानवीय सोच की विविधताओं से रुबरु होते हैं। वहीं क्लासिक से परे वर्तमान में आवश्यक सामग्री को विविध भाषाओं में उपलब्ध कराने पर उसकी उपयोगिता बढ़ जाती है, उपयोगकर्ता बढ़ जाते हैं और वह सामग्री ’ग्लोबल’ या ’वैश्विक’ की श्रेणी में शामिल हो जाती है।

अनुवाद के लिये प्रकाशन समूहों से लेकर दैनिक अखबार, अनुवाद एजेन्सियों से लेकर ई लर्निंग कंपनियां तक बेहतर विकल्पों की खोज में रहते हैं। सरकारी योजनाओं से लेकर दैनिक विज्ञापनों तक, उपभोक्ता वस्तुओं के विपणन से लेकर फार्मा कंपनियों तक, शिक्षा, मानव संसाधन, तकनीक, खेल, सेवा क्षेत्र तथा राजनीति तक का कोई भी क्षेत्र अनुवाद की आवश्यकता से अछूता नही है।

भारतीय परिवेश तो वैसे भी अनुवादन व्यवसाय के लिये सबसे उर्वर माना जाता है। यहां पर बोलचाल की भाषा हिन्दी या स्थानीय, समझ बूझ सकने की भाषा के रुप में मातृभाषा और शिक्षा प्राप्त करने के लिये अंग्रेजी या अन्य कोई भाषा, इस प्रकार से तीन भाषाएं सामान्य रुप से अधिकांश भारतीयों को ज्ञात होती है। सर्वाधिक प्रान्तीय या प्रादेशिक भाषाएं भी भारत की विशेषता है। इसका अर्थ है कि अनुवाद करने के लिये आवश्यक गुण भी भारतीयों में है और अनुवाद व्यवसाय के लिये बेहतर अवसर भी यहां मौजूद है।

इसके अलावा, वर्तमान में आपके क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा की आवश्यकता केवल उसी स्थान विशेष तक सीमित नही है। मनुष्य विश्व का नागरिक अवश्य बन गया है लेकिन जिस मिट्टी से उसकी जड़ों को प्रारंभिक पोषण मिला है, उसमें प्रमुख घटक है उसकी अपनी भाषा। सुदूर विदेशों में, धन और सुविधाओं से अटे पड़े घर में जब व्यक्ति अपनों से दूर होता है, तब उसे बाल कक्षाओं में समवेत स्वर में गाई जाने वाली पंक्तियां भी किसी स्वर्ग से कम नही लगती।

ये तो हुआ अनुवाद का संवेदनात्मक पहलू, लेकिन व्यावसायिकता के दौर में अनुवाद कहीं से भी किसी सेवा क्षेत्र के उत्पाद से कम नही है। बड़े वातानुकूलित कार्यालय में विदेशी शब्दकोश से जूझते अनुवादक हो या घर में सब्जी छौंककर उसे धीमी आंच पर पकने के अन्तराल में अपना अनुवादन प्रोजेक्ट पूरा करने वाली फ्रीलान्सर गृहिणी, प्रोफेसर्स के शोध प्रपत्रों का अनुवाद कर उन्हे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भेजने वाले विद्यार्थी हो या किसी उपन्यास को अनूदित करने वाला एक साहित्यिक! ये सभी अनुवाद के साथ केवल शब्दों के संबंध और साहित्यिक अभिलाषा की पूर्ति के लिये नही जुड़े हैं। व्यावसायिक रुप से इन सभी को तकनीक और भाषा ज्ञान के साझे सहयोग से अपनी सेवाओं का उचित प्रतिदान मिलता है।

अनुवाद उद्योग के बारे में सबसे अच्छी बात यह रही है कि वैश्विक मंदी के दौर में भी यह उद्योग अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। न तो काम में कमी आई और न ही दरों में कोई गिरावट। आज भी अंग्रेजी से फ्रेन्च और जर्मन भाषा में अनुवाद का व्यवसाय सबसे प्रथम स्थान पर मांग में बना हुआ है। इसके बाद जापानी, कोरियाई भाषा तथा हिन्दी समेत अन्य एशियाई भाषाओं का अंतर्राष्ट्रीय व्यवसाय अनुवादन हेतु विकसित हो रहा है।

अनुवादक बनना बड़ा आसान है, सही परीक्षा तब होती है जब आपको इस काम को निरंतर करना होता है। प्रत्येक अनुवाद प्रकल्प अपने आप में अलहदा होता है। उसके वाचक, उनकी भौगोलिक और सांस्कृतिक स्थिति, उपयोग किये जाने का समय और अन्य अनेक बिन्दुओं पर आधारित निर्देशों का पालन कर आपको अनुवाद करना होता है। उदाहरण के लिये, उच्च स्तरीय शोध संबंधी सामग्री के अनुवाद हेतु आपको अपना पूरा भाषा ज्ञान लगा देना होता है और नन्हे बच्चों के लिये निर्देश पुस्तिका का अनुवाद करते समय यथासंभव क्लिष्टता से बचते हुए सरल-सहज भाषा को अपनाना होता है।

वर्तमान समय में तकनीक को अनुवाद व्यवसाय का दोस्त भी माना जा रहा है और दुश्मन भी। गूगल ट्रान्सलेट, प्रॉम्प्ट, बेबीलोन जैसी सेवाएं सॉफ्टवेयर की मदद से तत्काल अनुवाद मुहैया करवा देती है। इसके कारण यह चिंता व्यक्त की जाती है कि जल्द ही अनुवादकों की कोई आवश्यकता नही रह जाएगी। परंतु हो इसके विपरीत रहा है। इस तकनीकी सहायता की मदद से अनुवादक बेहतर काम कर पा रहे हैं, अपनी गुणवत्ता को विकसित कर रहे हैं और कम समय में पूरे निर्देशों के पालन के साथ अपने प्रकल्प पूरे कर पा रहे हैं।

अनुवाद से जुड़े अन्य व्यवसाय हैं इन्टरप्रेटर या दुभाषिया, रि-राईटिंग या पुनर्लेखन, लोकलायजेशन या स्थानीयकरण, सब टायटलिंग या उप शीर्षक जिन्हे अक्सर हम फिल्मों में देखते हैं। अपनी भाषा पर बेहतर अधिकार के साथ तकनीकी रुप से समृद्ध व्यक्ति आज अनेक प्रकार से अपने व्यवसाय को आगे बढ़ा सकता है।

वर्तमान समय में अनुवादन के क्षेत्र में भी विशेष योग्यता को महत्व दिया जाने लगा है।  कई अनुवादक हैं जो केवल पेटेन्ट्स, शोध, कानूनी सामग्री या शिक्षा से संबंधित अनुवाद करते हैं। ज़ाहिर सी बात है कि जब आप विशेषज्ञता प्राप्त कर लेते हैं, तब आपको इसका प्रतिदान भी बेहतर मिलता है।

कुल मिलाकर अनुवाद आज की आवश्यकता ही नही विश्व नागरिक बनने की दिशा में आपका पहचान पत्र है। भारतीय होने के नाते हिन्दी के प्रति हमारा कर्तव्य सिर्फ १४ सितंबर के आस पास पुस्तक मेले आयोजित करना न होकर हिन्दी में पठन पाठन और शुद्ध बोलचाल को बढ़ावा देने का भी होना चाहिये। शुद्ध और अपने भाव पूरी तरह से व्यक्त करने वाली शालीन भाषा, एक संस्कार के समान है। यदि यह दूसरी संस्कृति से हमारा परिचय करवाती है, हमारी पहचान बनती है और जीवन के सही मूल्यों की अभिव्यक्ति में हमारा साथ देती है, तब भाषा की शुद्धता के प्रति हमारा भी इतना कर्तव्य तो बनता ही है।

अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस, अपनी भाषा के प्रति गर्व करने, उसे वैश्विक स्तर पर ऊंचा उठाने हेतु किये जाने वाले प्रयत्नों का दिवस है, शब्दों के प्रति आभार का दिवस है।

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Author: Antara Karvade

Owner at Anudhwani

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